महिषी

बिहार के सहरसा स्थित महिषी गाँव  में विश्व विख्यात दार्शनिक मंडन मिश्र का आविर्भाव हुआ था, साथ ही आदि शंकराचार्य के पवित्र चरण भी पड़े थे।                                                                                

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माँ उग्रतारा, महिषी

इस तथ्य की पुष्टि पुरातत्व वेत्ताओं और इतिहासकारों द्वारा की जा चुकी है। इसी स्थल पर जगत जननी उग्र तारा का प्राचीन मंदिर भी अवस्थित है और इसे “सिद्धता” भी प्राप्त है। यह भी उल्लेख मिलता है कि शिव तांडव में सती कि बायीं आँख इसी स्थान पर गिरी थी, जहाँ अक्षोभ्य ऋषि सहित नील सरस्वती तथा एक जाता भगवती के साथ महिमामयी उग्रतारा की मूर्ति भी विराजमान है।

पौराणिक आख्यानों की मानें तो जब भगवान शिव महामाया सती का शव लेकर विक्षिप्त अवस्था में ब्रह्मांड का विचरण कर रहे थे सती की नाभि महिषी गाँव में गिरी थी। मुनि वशिष्ठ ने उस जगह माँ उग्रतारा पीठ की स्थापना की। इसीलिए यह मंदिर सिद्ध पीठ और तंत्र साधना का केंद्र है। इस मंदिर से सौ कदम दूर लगभग दो एकड़ की एक वीरान भूमि है जहाँ पैर रखते ही एक अदृश्य आकर्षण आज भी होता है, इसी स्थान पर उस महापुरुष मंडन मिश्र का जन्म हुआ था जिनकी पत्नी भारती ने अपने पति के स्वाविमान, उनकी विद्वता और मानव कल्याण की भावना को किसी भी तरह के अधात से बताल, आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। 

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माँ उग्रतारा पीठ, महिषी

अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वशिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी। किंवदंतियां यह भी है कि निरंतर शास्त्रार्थ के कारण यहाँ के तोते और अन्य पक्षी भी शास्त्र की बातें करते थे।

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माँ उग्रतारा, महिषी

यह मंदिर एक सिद्ध तांत्रिक स्थल है जहाँ साधना करने हेतु दूर दूर से साधू समाज का आगमन होता रहा है। बौद्ध ग्रन्थ में दिए गए विवरण के अनुसार महात्मा बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्ति के बाद अपनी ज्ञान यात्रा प्रारंभ की तो उनके चरण यहाँ भी पड़े थे। उस काल में इस स्थल का नाम “आपण निगम” था। बाद में यहाँ एक अध्यन केंद्र की स्थापना की गई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत पुरातत्व विभाग द्वारा जो खुदाई की गई तो बोधिसत्वों की सैकड़ों मूर्तिया भूगर्भ से निकलीं जो आज राज्य और राष्ट्र  के विभिन्न संग्रहालयों में रखी हैं। यहाँ की मूर्तियां इतनी महत्वपूर्ण मानी गईं कि इन्हें फ़्रांस और ब्रिटेन में संपन्न भारत महोत्सवों में भी ले जाया गया था।बताया जाता है कि 16वीं शताब्दी में दरभंगा महाराज की पुत्रवधू रानी पद्मावती ने वास्तु स्थापत्य कला की उत्कृष्ट शैली से महिषी में तारा स्थान मंदिर का निर्माण कराया था। प्राचीन काल से ही उग्रतारा स्थान धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हेतु भारत, नेपाल के श्रद्धालुओं और साधकों का

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माँ उग्रतारा पीठ, महिषी

आकर्षण केन्द्र और तपोभूमि रही है। असाधारण काले पत्थरों से बनी सजीव, अलौकिक प्रतीत होती भगवती उग्रतारा की प्रतिमा में ऐश्वर्य, वैभव की पूर्णता, पराकाष्ठा और करुणा बरसाती ममतामयी वात्सल्य रूप की झलक मिलती है। उपासकों को भगवती उग्रतारा की प्रतिमा की भाव-भंगिमा में सुबह बालिका, दोपहर युवती और संध्या समय वृद्ध रूप का आभास होता है। पौराणिक शास्त्रानुसार वशिष्ठ मुनि ने महाचीन देश, तिब्बत में भगवती उग्रतारा की घनघोर तपस्या की थी। वशिष्ठ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती उग्रतारा जिस रूप में प्रकट हुई थी उसी रूप में वह वशिष्ठ के साथ महिषी आई और यहां उसी रूप में पत्थर में रूपान्तरित हो गयी। उग्रतारा स्थान देश के तीन प्रमुख तारा मंदिरों में से एक है।

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